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#अलविदा की हकी़क़त

जुम‌आ तुल वदा रमजान के आखरी जुम‌आ को कहने लगे हैंये कोई अलग से इसलामी त्यौहार नही है रमजान के दूसरे जुम‌ओं की तरह ये भी एक जुम्आ है कुर‌आन वा हदीश वा अकवाले फुकहा मे से कोई अलग से खोशूशियत या फजी़लत नही आई है
चूंकि ये रमजान शरीफ का आखरी जुम्आ है अलविदा का माना रूख्शती होना यानि अब रमजान का महीना रूख्शत होने वाला है
इस लिए इसको जुम्आ तुल वदा कहने लगे आज के हालात को सामने रखते हुए ए बेहतर है की इस दिन ऐसा काम या ऐसी बात ना की जाए जिस से लोग इस जुमे को अलग से खुशूशियत समझें
आला हजरत इमाम अहमद रजाखांन अलैहिर्रहमा व रिज़वान ने
फतावा रिज़वाया जदीद जिल्द नं 8सफहा नं 455 पर यही लिखा है
अलविदा न कहकर इसको सिर्फ जुम‌आ का नाम दिया जाये तो बेहतर है
इसके खुत्बे मे वही पढ़ना फर्ज या वाजिब या सुन्नत त है जो हर जुम्आ ो पढ़ा जाता है

किसी साल ऐसा होता है की रमजान की 30तारीख जुम्आ को पड़ रही है तो काफी लोग पूंछते हैं अलविदा कौन से जुम्आ को होगा
अगर चांद 29 ,का होगया तो रमजान से आगे हो जायेगा इस तरह का सवाल पूंछने वाले अनपढ़ वा बे इल्म वाले लोग होते हैं
जैसा की इस साल भी यही लोग पूंछ रहे हैं
मै कहता हूं इस जुमे की कोई खूशूशियत इस्लाम मे है ही नही तो पूंछते क्यौं हो

#रमजान का #तोहफा #सफहा नं40
मौलाना ततहीर अहमद रजवी बरेली
दुआ कातालिब
रमजान शेख